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24 Sep 2026, Thu

पीएम मोदी ने देवी-देवताओं को पानी में डुबोने की नहीं कही बात, वीडियो एडिटेड है

सोशल मीड‍िया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की एक वीड‍ियो क्‍ल‍िप काफी वायरल है। इस वीड‍ियो में पीएम मोदी को कथि‍त रूप से यह कहते हुए द‍िखाया गया है क‍ि सभी देवी-देवताओं को पानी में डुबोकर केवल भारत माता की पूजा करनी चाह‍िए।

क्या लिख रहे हैं लोग?

ऋतू राठौर ने एक्स पर वीडियो पोस्ट कर लिखा, ‘सारे देवी देवताओं कों डुबो दो नरेंद्र मोदी इस वीडियो में नरेंद्र मोदी ने अपने दिल के हर एक बात रख दी है, वह अंदर से क्या है , अंदर से हिंदू धर्म के लिए जो नफ़रत है , देवी देवताओं के लिए जो नफ़रत है वह सब इस वीडियो में देख लो,, ये वह वीडियो है जो BJP का IT cell और गोदी मीडिया आपको कभी नहीं दिखायें हे   इतनी नफ़रत कौन करता है हिंदुओं से ? mulla’

अनुज अग्रवाल ने लिखा, ‘भाई, लगता है हमारी आँख और कान दोनों ही खराब हो गए हैं 😂 आँखों से तो नरेंद्र मोदी जी ही दिखाई दे रहे हैं, लेकिन दावा है कि उन्होंने कहा—“सभी देवी-देवताओं को पानी में डुबा देना चाहिए।” क्या सच में मोदी जी ने ऐसा कहा है, या हम कुछ और सुन रहे हैं और दावा कुछ और किया जा रहा है?’

अनुमा आचार्य ने लिखा, ‘मोदी जी ने कहा था कि सारे भगवानों को पानी में डुबो दो….और इसीलिए उन्होंने पूरे शहर में पानी-पानी भरवा दिया है, संसद में भी पानी भरवा दिया है कि आपको भगवानों को डुबोने के लिए इधर-उधर न जाना पड़े. ये मैं नहीं कह रही हूँ, ये भक्त कह रहे हैं’

क्या है हकीकत? 

पड़ताल में हमे 12 जनवरी 2012 नरेंद्र मोदी के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर पूरा वीडियो मिला। इस वीडियो में 13:29 से 15:56 मिनट के बीच मोदी कहते हैं, ‘1902 में स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था, जीवन के अंतकाल में कहा था कि मेरे देशवासियों, आप बहुत सारे भगवानों की पूजा करते हो, ईश्वर के पीछे आप पागल हो। सुबह-शाम आरती, धूप, माला जप करते रहते हो। समय की मांग है। देखिए, जो इंसान अपनी जवानी भगवान को पाने के लिए पागल की तरह खपा चुका था, जीवन के अंतकाल में पहुंचते समय दुनिया को कहता है, हिंदुस्तान को कहता है कि तुम्हारे जो भगवान हैं, तुम जो ईश्वर के पीछे पागल बैठे हो, इन सारे के सारे भगवानों को पानी में डुबो दो। कल्पना कर सकते हो, जिस व्यक्ति ने घर छोड़ा था ईश्वर को पाने के लिए, वह संसार छोड़ने से पहले कहता है कि तुम अपने सारे ईश्वर को पानी में डुबो दो और समय की मांग है- एकमात्र आराध्य देव हो तुम्हारा, एक ही तुम्हारी माता हो, एक ही तुम्हारा ईश्वर हो, एक ही तुम्हारी शक्ति हो, और वो हो मां भारती। तुम भारत मां की पूजा करो, सारे देवी-देवताओं को डुबो दो। मित्रों, अध्यात्म की यात्रा कहां से कहां ले जाती है। एक 40 साल का तरुण संन्यासी, जो घर छोड़कर निकला ईश्वर को पाने के लिए, वो दुनिया को कहने का सामर्थ्य ले लेता है कि तुम डुबो दो अपने ईश्वर को, मां भारती की सेवा करो। एक ही तुम्हारा आराध्य हो।’

इसी कार्यक्रम में गुजराती भाषा में ‘स्‍वामी व‍िवेकानंद युवा पर‍िषद’ ल‍िखा है। इस सम्बन्ध में हमे ‘द ह‍िंदू’ की एक खबर म‍िली। इसमें बताया गया क‍ि गुजरात सरकार ने स्‍वामी व‍िवेकानंद की 150वीं जयंती के उपलक्ष्‍य में वर्ष 2012 को ‘युवा शक्‍ति वर्ष’ के रूप में मनाने का न‍िर्णय ल‍िया था।

पड़ताल में आगे हमे स्वामी विवेकानंद का मद्रास में दिया गया भाषण मिला। हालाँकि यह भाषण 1902 नहीं, फरवरी 1897 का है। स्वामी विवेकानंद ने कहा, “हममें एक और दोष है। देवियों, क्षमा कीजिए, लेकिन सदियों की गुलामी के कारण हम एक स्त्री-प्रधान राष्ट्र बन गए हैं। इस देश में या किसी भी अन्य देश में मुश्किल से तीन स्त्रियाँ पाँच मिनट के लिए एक साथ मिल पाती हैं, और वे आपस में झगड़ने लगती हैं। यूरोपीय देशों में स्त्रियाँ बड़े-बड़े समाज बनाती हैं, नारी शक्ति आदि के बड़े-बड़े दावे करती हैं; फिर वे आपस में झगड़ने लगती हैं, और कोई पुरुष आकर उन सब पर राज करने लगता है। पूरी दुनिया में आज भी उन्हें किसी पुरुष की आवश्यकता होती है जो उन पर शासन करे। हम भी उन्हीं की तरह हैं। हम स्त्रियाँ हैं। यदि कोई स्त्री स्त्रियों का नेतृत्व करने आती है, तो वे सब तुरंत उसकी आलोचना करने लगती हैं, उसे टुकड़े-टुकड़े कर देती हैं और उसे चुप करा देती हैं। यदि कोई पुरुष आकर उनके साथ थोड़ा कठोर व्यवहार करता है, कभी-कभार उन्हें डांटता है, तो सब ठीक है, क्योंकि वे इस तरह के सम्मोहन की आदी हो चुकी हैं। पूरी दुनिया ऐसे सम्मोहनकर्ताओं और सम्मोहनकर्ताओं से भरी पड़ी है। इसी तरह, यदि हमारे देश का कोई व्यक्ति उठ खड़ा होता है और महान बनने की कोशिश करता है, तो हम सब उसे दबाने की कोशिश करते हैं, लेकिन यदि कोई विदेशी आकर हमें लात मारने की कोशिश करता है, तो सब ठीक है। हमें इसकी आदत हो गई है, है ना? और गुलामों को महान स्वामी बनना ही होगा! इसलिए गुलामी छोड़ दो। अगले पचास वर्षों तक यही हमारा मूलमंत्र रहेगा—यह, हमारी महान भारत माता। बाकी सभी व्यर्थ देवताओं को कुछ समय के लिए हमारे मन से विमुख कर दो। यही एकमात्र जागृत देवता है, हमारी अपनी जाति— “हर जगह उनके हाथ, हर जगह उनके पैर, हर जगह उनके कान, वे सब कुछ ढक लेते हैं।” बाकी सभी देवता सो रहे हैं। हम किन व्यर्थ देवताओं के पीछे भागें, जबकि हम उस देवता की पूजा नहीं कर सकते जो हमारे चारों ओर दिखाई देता है, विराट? जब हम इसकी पूजा कर लेंगे, तब हम बाकी सभी देवताओं की पूजा कर सकेंगे। आधा मील रेंगने से पहले ही हम हनुमान की तरह सागर पार करना चाहते हैं! यह संभव नहीं है। हर कोई योगी बन जाएगा, हर कोई ध्यान करेगा! यह संभव नहीं है। सारा दिन कर्मकांड में संसार के साथ घुलमिल जाना, और शाम को बैठकर नाक साफ करना! क्या यह इतना आसान है? क्या नाक से तीन बार साफ करने पर ऋषि हवा में उड़ते हुए आ जाएंगे? क्या यह मजाक है? यह सब बकवास है। ज़रूरत है चित्तशुद्धि की, हृदय की शुद्धि की। और यह कैसे प्राप्त होती है? सर्वप्रथम पूजा विराट की है—हमारे चारों ओर मौजूद सभी की। इसकी पूजा करो। पूजा संस्कृत शब्द का सटीक पर्याय है, कोई अन्य अंग्रेजी शब्द इसके लिए उपयुक्त नहीं होगा। ये सभी हमारे देवता हैं—मनुष्य और पशु; और जिन पहले देवताओं की हमें पूजा करनी है, वे हमारे देशवासी हैं। हमें एक-दूसरे से ईर्ष्या करने और आपस में लड़ने के बजाय इनकी पूजा करनी चाहिए। यह सबसे भयानक कर्म है जिसके लिए हम भोग रहे हैं, फिर भी यह हमारी आँखें नहीं खोलता! “

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