उत्तर प्रदेश की 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती मामले में राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि वह हाईकोर्ट के 13 अगस्त 2024 के आदेश के मुताबिक योग्य आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने पर विचार करने को तैयार है जो मूल चयन सूची में शामिल होने के हकदार थे लेकिन चयन से बाहर रह गए। सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार के प्रस्ताव को रिकॉर्ड पर लेते हुए पूरी प्रक्रिया तैयार करने के लिए 6 सप्ताह का समय दिया है। इस बीच समाजवादी पार्टी के सुप्रीमों अखिलेश यादव ने शिक्षक भर्ती में भेदभाव का आरोप लगाया है, साथ ही उन्होंने कहा कि सपा सरकार बनने पर 90 दिन के अंदर 69 हजार शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों को न्याय दिलाने का काम करेगी।
अखिलेश यादव साल 2027 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के 90 दिनों में 69 हजार शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों को न्याय दिलाने का आश्वासन दे रहे हैं हालाँकि उनके कार्यकाल में भर्तियों में लापरवाही का रिकोर्ड रहा है।
72,825 शिक्षकों की भर्ती विवाद
मायावती सरकार ने नवंबर 2011 में टीईटी मेरिट के आधार पर शिक्षकों की भर्ती का निर्णय करते हुए 30 नवंबर को विज्ञापन निकाला। 72,825 शिक्षकों की भर्ती करीब 63 लाख टीईटी पास बीएड वालों ने आवेदन किए। यह प्रक्रिया पूरी हो पाती, इस बीच 24 दिसंबर 2012 को विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो गई। इसके चलते भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई और इसी बीच टीईटी में गड़बड़ी के आरोप में तत्कालीन माध्यमिक शिक्षा निदेशक संजय मोहन गिरफ्तार भी कर लिए गए।
वहीं साल 2022 में विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में सत्ता बदल गई और अखिलेश सरकार आई। इस सरकार ने टीईटी मेरिट के स्थान पर शैक्षिक मेरिट से शिक्षकों की भर्ती करने का निर्णय करते हुए एनसीटीई से 31 मार्च 2014 तक प्रकिया पूरी करने का समय भी ले लिया पर मामला हाईकोर्ट में जाकर फंस गया। हाईकोर्ट ने 4 फरवरी 2013 को शिक्षक चयन के लिए शुरू हुई काउंसलिंग पर रोक लगा दी और नौ माह बाद फैसला दिया कि शिक्षकों की भर्ती टीईटी मेरिट पर ही की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। इससे साफ हो गया है कि शिक्षकों की भर्ती ढाई साल पहले जिस प्रक्रिया के साथ शुरू हुई थी, उसी के आधार पर पूरी की जाएगी।
यानि अखिलेश यादव की वजह से 72,825 शिक्षकों की भर्ती का मामला दो साल लटकाया गया। कमाल की बात है कि इस सम्बन्ध में दो नवम्बर 2012 को प्रकाशित अमर उजाला ने अपनी रिपोर्ट ने यह बात पहले ही लिख दी थी कि अखिलेश सरकार प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती में शायद सियासी फायदे तलाश रही है।

रिपोर्ट में बताया गया कि अखिलेश यादव की सरकार में इस भर्ती से होने वाले नफा-नुकसान को देखा जा रहा है। यह तलाशा जा रहा है कि तुरंत शिक्षकों की भर्ती से क्या फायदा होगा और कुछ माह बाद भर्ती से कितना फायदा होगा। क्योंकि शिक्षकों की भर्ती से भले ही फौरी तौर पर 72 हजार 825 युवक और युवतियां लाभाविंत होंगे लेकिन फायदा लाखों परिवारों को मिलेगा। जानकार तो यह भी कहते हैं कि शिक्षकों की तुरंत भर्ती से सरकार को कोई फायदा नहीं दिख रहा है। शायद इसीलिए भर्ती प्रक्रिया के लिए बार-बार नियम बदल कर इसे लटकाया जा रहा है। वजह साफ है, क्योंकि वर्ष 2014 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और सरकार इसका फायदा जरूर लेना चाहेगी।
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में 72825 सहायक अध्यापकों को इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश के मुताबिक नियुक्ति देने का आदेश जारी किया है। सर्वोच्च अदालत ने हालांकि नियुक्ति प्रक्रिया को 31 मार्च तक पूरा करने के हाईकोर्ट के आदेश में बदलाव कर राज्य सरकार को इसके लिए 12 हफ्ते का समय प्रदान कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि नियुक्तियों का भविष्य इस मुद्दे पर सर्वोच्च अदालत की ओर से जारी किया गया अंतिम आदेश तय करेगा।
अखिलेश सरकार ने शिक्षामित्रों को लटकाया
26 मई 1999 को कल्याण सिंह सरकार ने शिक्षामित्रों की नियुक्ति का आदेश जारी किया था। इसके लिए शैक्षिक योग्यता 12वीं पास रखी गई। इसकी शुरुआत गोरखपुर से हुई और उन्हें 11 महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया। इसके बाद 2001 में पूरे प्रदेश में शिक्षामित्रों की नियुक्ति का फरमान जारी हुआ।
अखिलेश यादव की सरकार ने जून 2014 में 1.72 लाख शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक का दर्जा दे दिया। शासनादेश में जूनियर हाईस्कूलों में उनकी सहायक शिक्षक के तौर पर तैनाती के निर्देश हुए। आदेश में कहा गया कि शिक्षामित्रों के समायोजन में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता नहीं रहेगी। सरकार के इस फैसले के बाद टीईटी पास अभ्यर्थी हाईकोर्ट पहुंच गए। 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द कर दिया। इस फैसले के बाद कई शिक्षामित्रो ने आत्महत्या कर ली।
वहीं जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और यू.यू. ललित की विशेष पीठ ने शिक्षामित्रों के नियमितीकरण को गैरकानूनी ठहराने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को सही माना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य को आरटीई एक्ट की धारा 23(2) के तहत शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यताओं को घटाने का कोई अधिकार नहीं है। आरटीई की बाध्यता के कारण राज्य सरकार ने योग्यताओं में रियायत देकर शिक्षामित्रों को नियुक्ति दी थी।
इस प्रकरण को लेकर हिंदुस्तान ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि शिक्षामित्र आज सड़क पर हैं तो इसकी सबसे बड़ी वजह सियासत और इसके दांवपेंच हैं। तत्कालीन सपा सरकार ने शिक्षामित्रों को समायोजित करने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया और भुगतना शिक्षामित्रों को पड़ रहा है। वर्ष 2010 तक यह शिक्षामित्र मानदेय पाकर ही खुश थे। वे 3500 रुपये के मानदेय को बढ़ाने की मांग भले ही करते रहे हो लेकिन पक्की नौकरी का सपना नहीं था।
भर्तियां कर लीं, तब आई पद सृजन की याद
मई 2015 को प्रकाशित एनबीटी की रिपोर्ट के मुताबिक अखिलेश यादव की सरकार ने शिक्षकों की भर्ती और समायोजन तो बड़े पैमाने पर शुरू कर दिए थ, लेकिन उतने पद (posts) आधिकारिक तौर पर बनाए ही नहीं गए थे। यानी पहले भर्ती/समायोजन की घोषणा हुई, बाद में सरकार को याद आया कि इन लोगों को रखने के लिए पद सृजन भी जरूरी है।
प्रदेश सरकार ने पहले तो सभी 1,72,000 शिक्षा मित्रों को शिक्षक बनाने का शासनादेश कर दिया। इसी बीच 72,000 टीईटी शिक्षकों की भर्ती शुरू कर दी। साथ ही बीटीसी के जरिए 5,030 भर्ती कर लिए गए और 15,000 के आवेदन लिए जा चुके हैं। अभी टीईटी में भी करीब 54,000 ही भर्तियां हुई हैं। वहीं शिक्षा मित्रों को दो चरणों में शिक्षक बनाए जाने की जो प्रक्रिया शुरू हुई है, उसी में पद कम पड़ रहे हैं। करीब 92 हजार शिक्षा मित्रों को 30 अप्रैल तक शिक्षक बनाए जाने के निर्देश दिए गए थे लेकिन पद कम पड़ने के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। कई जिलों ने विज्ञापन ही नहीं निकाला।
69000 शिक्षक भर्ती विवाद
आज तक ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि उत्तर प्रदेश में जब अखिलेश सरकार थी, तब 1 लाख 37 हजार शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक के रूप में समायोजित कर दिया गया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और समायोजन को रद्द कर दिया गया यानी अखिलेश सरकार ने जिन शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक बना दिया था, वह फिर से शिक्षामित्र बन गए। अब इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 1 लाख 37 हजार पदों पर भर्ती का आदेश योगी सरकार को दिया। योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हम एक साथ इतने पद नहीं भर सकते हैं फिर सुप्रीम कोर्ट ने दो चरण में सभी पदों को भरने का आदेश दिया। इस आदेश के बाद योगी सरकार ने 2018 में पहले 68500 पदों के लिए वैकेंसी निकाली। इसके बाद दूसरे चरण में 69000 सहायक शिक्षक भर्ती थी।
69 हजार सहायक शिक्षक पदों के लिए निकली इस भर्ती की परीक्षा 6 जनवरी 2019 को हुई। इस भर्ती के तहत करीब 68 हजार लोगों को नौकरी मिली। इस शिक्षक भर्ती में आरक्षण को लेकर अनियमितता के आरोप लगे थे। विसंगतियों का आरोप लगाते हुए कई लोग कोर्ट गए। अभ्यर्थियों ने दावा किया कि 69 हजार शिक्षक भर्ती में ओबीसी वर्ग को 27% की जगह मात्र 3.86% आरक्षण मिला यानी ओबीसी वर्ग को 18598 सीट में से मात्र 2637 सीट मिलीं। ठीक इसी तरह एससी वर्ग को भी 21% की जगह 16.6% आरक्षण मिला।
वहीं 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती मामले में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने शिकायतकर्ता की शिकायत के आधार पर रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट में 5,844 सीटों पर आरक्षण में गड़बड़ी सामने आई थी।

हालाँकि सरकार का कहना है कि 69000 शिक्षक भर्ती में अन्य पिछड़ा वर्ग के 18000 से अधिक पदों पर भर्ती होनी थी। इसके सापेक्ष इस वर्ग के 31000 से अधिक अभ्यर्थियों का चयन हुआ। इसमें 18598 ओबीसी कोटे में तथा 12630 ओबीसी अभ्यर्थी अनारक्षित श्रेणी में चयनित हुए हैं। अनुसूचित जाति के लिए 14000 से अधिक पद आरक्षित थे। इन पर तो एससी वर्ग के युवाओं का चयन हुआ ही, नियमों के अनुरूप मेरिट के आधार पर 1600 से अधिक अनुसूचित जाति के अभ्यर्थी अनारक्षित श्रेणी में भी चयनित हुए। शेष 1100 से अधिक अनुसूचित जनजाति के खाली पदों को अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों से भरा गया है। इस तरह एससी के 17000 से अधिक अभ्यर्थियों का चयन हुआ है। भर्ती में अनारक्षित श्रेणी के 34 हजार से अधिक पदों में 20301 सामान्य श्रेणी, 12630 अन्य पिछड़ा वर्ग, 1637 अनुसूचित जाति, 21 अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थी अनारक्षित श्रेणी में चयनित हुए हैं।
