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4 Jun 2026, Thu

क्या उत्तर प्रदेश में लू से 8,056 लोगों की मौत हो चुकी है?

देश में भीषण गर्मी और लू (Heatwave) का प्रकोप जारी है, और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार व महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में तापमान 48°C के करीब पहुंच गया है。दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से अधिकांश शहर भारत से हैं, इस बीच सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में लू (हीटवेव) के कारण 8,056 लोगों की मौत हो चुकी है।

ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने भी एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए लिखा, ‘5 दिनों में 8,056 मौतें: हीटवेव (लू) के दौरान उत्तर प्रदेश भारत का सबसे घातक राज्य बनकर उभरा।’

पत्रकार रोमिता तिवारी ने लिखा, ‘यूपी में हीटवेव से 5 दिनों में 8,056 लोगों की मौत हुई। एक अध्ययन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में पांच दिनों की भीषण लू से बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं। यह भारत में लू से होने वाली मौतों का सबसे घातक हॉटस्पॉट बन गया है।’

समाजवादी पार्टी समर्थक लूफी ने लिखा, ‘यूपी में ‘लू’ के कारण 5 दिनों में कुछ नहीं बल्कि हजारों लोग मर गए’

इसके अलावा Licypriya Kangujam ने भी यही दावा किया है।

क्या है हकीकत?

पड़ताल में इस संबंध में ABP News की वेबसाइट पर प्रकाशित रिपोर्ट मिली। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया है। इसी बढ़ती गर्मी के खतरे को समझने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले (UC Berkeley) के शोधकर्ताओं पीयूष नारंग और अशोक गाडगिल ने एक अध्ययन किया है।

इसके बाद हमे Frontiers in Environmental Health में प्रकाशित स्टडी भी मिली। इस शोध का उद्देश्य यह पता लगाना था कि यदि भारत में भीषण हीटवेव की स्थिति बने तो उससे संभावित अतिरिक्त मौतें कितनी हो सकती हैं।

स्टडी में वास्तव में क्या कहा गया है?

शोधपत्र में लिखा गया है: “Uttar Pradesh alone accounts for approximately 8,056 excess deaths during a five-day heatwave.”

यहां सबसे महत्वपूर्ण शब्द है “Excess Deaths” (अतिरिक्त मौतें)। अतिरिक्त मौतों का मतलब उन मौतों से है जो किसी हीटवेव जैसी घटना के दौरान सामान्य परिस्थितियों की तुलना में अधिक होने का अनुमान लगाया जाता है। यानी यह संख्या वास्तविक रूप से गिनी गई मौतों की नहीं है, बल्कि एक सांख्यिकीय मॉडल के आधार पर लगाया गया अनुमान है। शोधकर्ताओं ने यह आंकड़ा कैसे निकाला? अध्ययन में शोधकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश या देश के सभी जिलों में हुई वास्तविक मौतों का डेटा एकत्र नहीं किया।

इसके बजाय उन्होंने:

  • वर्ष 2020 के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के मृत्यु आंकड़ों का उपयोग किया।
  • 2024 की अनुमानित जनसंख्या को आधार बनाया।
  • भारत के केवल 10 शहरों पर किए गए एक पुराने अध्ययन (de Bont et al., 2024) से हीटवेव और मृत्यु-दर के बीच संबंध निकाला। फिर उन निष्कर्षों को पूरे देश के 765 जिलों पर लागू किया।

अर्थात 8,056 का आंकड़ा किसी अस्पताल, श्मशान घाट, मृत्यु प्रमाणपत्र या सरकारी रिकॉर्ड से नहीं आया है।

यह पूरी तरह एक मॉडल आधारित अनुमान (Model-Based Estimate) है। शोधपत्र स्वयं स्वीकार करता है कि जिला-स्तर पर हीटवेव और मृत्यु-दर का प्रत्यक्ष डेटा उपलब्ध नहीं था। इसी कारण शोधकर्ताओं ने 10 शहरों के अध्ययन को पूरे भारत पर लागू किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न जिलों को उनकी जलवायु के आधार पर किसी एक अध्ययन-शहर से जोड़ा गया और फिर उसी शहर के जोखिम गुणांक (Risk Coefficients) को उन जिलों पर लागू कर दिया गया। यानी उत्तर प्रदेश के जिलों में वास्तव में कितनी मौतें हुईं, यह शोध का प्रत्यक्ष निष्कर्ष नहीं है।

ग्रामीण इलाकों के लिए कोई अलग अध्ययन नहीं

शोधकर्ताओं ने अपनी “Limitations” में स्पष्ट लिखा है कि 10 शहरी केंद्रों (Urban Centres) के आंकड़ों को ग्रामीण क्षेत्रों पर भी लागू किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार:

“Risk coefficients from ten urban centers are applied to all districts including rural ones.”

इसका मतलब है कि गांवों और कस्बों के लिए अलग से कोई मृत्यु अध्ययन नहीं किया गया। जबकि ग्रामीण इलाकों में:

  • स्वास्थ्य सुविधाएं अलग हैं,
  • रोजगार की प्रकृति अलग है,
  • बाहर काम करने वाले लोगों की संख्या अधिक है,
  • गर्मी का प्रभाव भी अलग हो सकता है।

इसीलिए लेखक स्वयं मानते हैं कि यह केवल अनुमान है।

2020 का मृत्यु डेटा इस्तेमाल किया गया, जो कोविड का वर्ष था

अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण सीमा यह है कि आधारभूत मृत्यु-दर (Baseline Mortality) वर्ष 2020 के आंकड़ों पर आधारित है। रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि 2020 कोविड महामारी का वर्ष था और उस दौरान मृत्यु आंकड़ों में असामान्य बदलाव आए थे।

शोधकर्ताओं के अनुसार:

  • कुछ राज्यों में मृत्यु-दर सामान्य से अधिक थी,
  • कुछ जगहों पर मृत्यु पंजीकरण भी प्रभावित हुआ था।
  • इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मॉडल में इस्तेमाल की गई आधारभूत मृत्यु-दर पूरी तरह सटीक थी।

यानी 8,056 मौतों का अनुमान किसी वास्तविक घटना के बाद नहीं लगाया गया, बल्कि एक मॉडल्ड (Modelled) परिदृश्य के आधार पर निकाला गया। रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा गया है:

“This figure is not an annual forecast.”

यानी यह संख्या न तो भविष्यवाणी है और न ही वास्तविक मौतों का रिकॉर्ड। इसका उद्देश्य केवल यह दिखाना है कि यदि अध्ययन में परिभाषित हीटवेव जैसी स्थिति बने तो संभावित प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है।

स्टडी में अनिश्चितता भी मौजूद है, शोधकर्ताओं ने अपने अनुमान के साथ 95 प्रतिशत Confidence Interval भी दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर पांच दिन की हीटवेव के लिए अनुमान, 18,000 से 43,000 अतिरिक्त मौतों के बीच है। इतनी बड़ी रेंज यह दर्शाती है कि यह एक सांख्यिकीय अनुमान है, न कि वास्तविक गिनती। यदि वास्तव में मौतें दर्ज की गई होतीं तो इस तरह की अनिश्चितता सीमा नहीं होती।

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