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6 Jun 2026, Sat

उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था: आंकड़ों से परे की सच्चाई

उत्तर प्रदेश, जो जनसंख्या के आधार पर भारत का सबसे बड़ा राज्य है, एक दशक पहले तक देश के बीमारू राज्यों में गिना जाता था। हालांकि, वर्ष 2026 में उत्तर प्रदेश देश के सबसे तेजी से प्रगति करने वाले राज्यों में अपनी पहचान बना चुका है। राज्य आज भारत की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरकर सामने आया है और देश के GDP में इसका योगदान लगभग 9.2 प्रतिशत है। राज्य सरकार उत्तर प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसी बीच अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव भी राज्य के विकास और भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

उत्तर प्रदेश की आर्थिक प्रगति और आगामी चुनावों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच हाल ही में द प्रिंट ने एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें राज्य की अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों और दावों पर सवाल उठाए गए हैं। लेख में यह भी दावा किया गया है कि अखबारों और सरकारी बयानों में प्रस्तुत आर्थिक वृद्धि के आंकड़े वास्तविकता से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जा रहे हैं तथा राज्य की विकास दर बताई जा रही दर से कम है।

इस लेख में हम द प्रिंट द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट का तथ्यात्मक विश्लेषण करेंगे और उसमें किए गए दावों की पड़ताल करेंगे।

1. जीएसडीपी वृद्धि और जनसंख्या का प्रश्न

उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है। किसी भी राज्य या देश की प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) का आकलन उसकी कुल जीडीपी अथवा जीएसडीपी को कुल आबादी से विभाजित करके किया जाता है। इसी कारण उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय का विश्लेषण करते समय जनसंख्या से जुड़े कारकों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश की आबादी के आंकड़ों को प्रभावित करने वाले कई विशेष कारण हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिकों की राज्य में वापसी हुई थी। इसके अलावा नोएडा, गाजियाबाद और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रमिक रोजगार की तलाश में आते हैं। ऐसे में राज्य की वास्तविक निवासी आबादी और आर्थिक गतिविधियों में शामिल जनसंख्या के बीच अंतर देखने को मिलता है, जिसका अर्थ यह है कि राज्य की जनसंख्या में वृद्धि आंशिक रूप से आर्थिक अवसरों के कारण हो रही है, जो स्वयं में एक सकारात्मक संकेत है।

दूसरी ओर, आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़े बताते हैं कि देश में आकस्मिक श्रमिकों (Casual Workers) की आय में पिछले सात वर्षों के दौरान लगभग 2.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इस प्रवृत्ति में उत्तर प्रदेश भी शामिल है।

Source: The Economic Times

उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश में एक सामान्य दैनिक मजदूर प्रतिदिन औसतन 350 से 500 रुपये कमाता है। यदि वह वर्ष में 250 दिन भी काम करे, तो उसकी वार्षिक आय 87,500 से 1,25,000 रुपये के बीच होती है। यह आय राज्य की आधिकारिक प्रति व्यक्ति आय के करीब या उससे अधिक है, फिर भी यह जीएसडीपी की गणना में पूरी तरह दर्ज नहीं होती। इसके अतिरिक्त, प्रति व्यक्ति आय को किसी राज्य की आर्थिक प्रगति का एकमात्र पैमाना मानना भी उचित नहीं है, विशेषकर तब जब राज्य कृषि प्रधान हो और साथ ही विनिर्माण क्षेत्र में तेजी से उभर रहा हो। प्रति व्यक्ति आय मूलतः एक औसत आंकड़ा है, जो आय के वास्तविक वितरण को प्रतिबिंबित नहीं करता।

उदाहरण के लिए, यदि किसी राज्य की जीएसडीपी 1,000 रुपये हो और उसकी आबादी 100 हो, तो प्रति व्यक्ति आय 10 रुपये होगी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य का प्रत्येक व्यक्ति 10 रुपये ही कमा रहा है। वास्तविकता में कोई व्यक्ति 20 रुपये कमा सकता है, जबकि कोई अन्य केवल 5 रुपये। इसलिए प्रति व्यक्ति आय केवल औसत आय को दर्शाती है, न कि नागरिकों की वास्तविक आय स्थिति को।

चूंकि उत्तर प्रदेश की जनसंख्या देश में सबसे अधिक है, इसलिए केवल प्रति व्यक्ति आय के आधार पर राज्य की आर्थिक प्रगति का मूल्यांकन करना भ्रामक निष्कर्षों को जन्म दे सकता है। किसी भी राज्य के विकास का आकलन करते समय जीएसडीपी वृद्धि, रोजगार सृजन, औद्योगिक विस्तार, आधारभूत ढांचे के विकास और नागरिकों की जीवन गुणवत्ता जैसे अन्य संकेतकों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

2-अनदेखी आय: प्रवासी श्रमिकों की कमाई का पूरा चित्र क्यों नहीं दिखता?

उत्तर प्रदेश वह राज्य है जहां से सबसे बड़ी संख्या में श्रमिक रोजगार की तलाश में देश के अन्य राज्यों में जाते हैं। जनगणना 2011 के अनुसार उत्तर प्रदेश से लगभग 83 लाख निवासी अन्य राज्यों में जा चुके थे, और आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष औसतन 90 लाख लोग रोजगार के लिए राज्य से बाहर जाते हैं। ये प्रवासी श्रमिक महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा, कर्नाटक और अन्य राज्यों में काम करते हैं तथा अपनी आय का एक हिस्सा नियमित रूप से अपने परिवारों को उत्तर प्रदेश भेजते हैं।

Source: PRS

हालांकि, जब राज्य की आर्थिक स्थिति का आकलन जीएसडीपी के आधार पर किया जाता है, तब प्रवासी श्रमिकों द्वारा अपने घर भेजी जाने वाली इस राशि का प्रभाव पूरी तरह से दिखाई नहीं देता। यह धनराशि उत्पादन नहीं, बल्कि आय हस्तांतरण है, इसलिए जीएसडीपी की गणना पद्धति में यह शामिल नहीं होती – जबकि इसका प्रभाव जमीनी स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखता है। यह धनराशि प्रायः बैंक हस्तांतरण, डिजिटल भुगतान या अन्य माध्यमों से परिवारों तक पहुंचती है, जिससे ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष लाभ मिलता है।

उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान इस आंतरिक प्रेषण प्रवाह पर सर्वाधिक निर्भर राज्यों में शामिल हैं। राज्य के बाहर कार्यरत लाखों लोगों द्वारा अपने परिवारों को भेजी जाने वाली धनराशि स्थानीय उपभोग, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास पर होने वाले खर्च को बढ़ाती है तथा राज्य की अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत करती है। इसलिए केवल जीएसडीपी या प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों के आधार पर उत्तर प्रदेश की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन करने से राज्य की वास्तविक आर्थिक गतिविधियों और आय प्रवाह का पूरा चित्र सामने नहीं आ पाता।

3. असंगठित क्षेत्र की अधूरी गणना और आर्थिक गतिविधियों का वास्तविक स्वरूप

उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र (Informal Sector) पर आधारित है। इसमें छोटे व्यापारी, स्वरोजगार से जुड़े लोग, कुटीर उद्योग, पारिवारिक व्यवसाय, दैनिक मजदूर और अन्य ऐसी आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं, जिनका पूरा लेखा-जोखा औपचारिक आर्थिक आंकड़ों में दर्ज नहीं हो पाता। यही कारण है कि राज्य की आर्थिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जीएसडीपी के आकलन में पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं होता। उत्तर प्रदेश में असंगठित क्षेत्र की वास्तविक वृद्धि का अनुमान जीएसटी पंजीकरण में आई तेजी से लगाया जा सकता है।

उत्तर प्रदेश आज देश में सबसे अधिक जीएसटी पंजीकृत करदाताओं वाला राज्य बन चुका है। राज्य में जीएसटी पंजीकरणों की संख्या 10 लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है। वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान देशभर में लगभग 25 लाख नए जीएसटी पंजीकरण हुए। वहीं फरवरी 2026 के जीएसटी आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने पोस्ट-सेटलमेंट राजस्व में 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो राज्य की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के तेजी से औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल होने का संकेत देती है।

Source: The Impressive Times

जीएसटी पंजीकरण में यह वृद्धि इस बात का भी संकेत है कि संबंधित आर्थिक गतिविधियां पहले से मौजूद थीं, लेकिन वे औपचारिक आंकड़ों के दायरे से बाहर थीं। औपचारीकरण नई आर्थिक गतिविधि का सृजन नहीं करता, बल्कि पहले से संचालित आर्थिक गतिविधियों को सरकारी रिकॉर्ड और कर व्यवस्था के दायरे में लाता है। ऐसे में जब बड़ी संख्या में व्यवसाय और कारोबारी इकाइयां औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनती हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि राज्य की वास्तविक आर्थिक गतिविधि आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक व्यापक रही है। इसलिए केवल जीएसडीपी के आधार पर आर्थिक प्रदर्शन का मूल्यांकन करने से उत्तर प्रदेश की वास्तविक आर्थिक क्षमता और गतिविधियों का पूर्ण चित्र सामने नहीं आता।

4. कृषि क्षेत्र: बदलती संरचना और भविष्य की संभावनाएं

द प्रिंट ने अपने लेख में उल्लेख किया है कि उत्तर प्रदेश की जीएसडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 25.8 प्रतिशत है, जबकि राज्य के कुल कार्यबल का लगभग 52 प्रतिशत हिस्सा कृषि पर निर्भर है। लेख के अनुसार, उत्पादन और रोजगार के बीच यह 26 प्रतिशत अंकों का अंतर राज्य की अर्थव्यवस्था में एक गंभीर संरचनात्मक चुनौती को दर्शाता है। हालांकि यह तर्क अतीत के संदर्भ में काफी हद तक उचित माना जा सकता है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में कृषि क्षेत्र में हो रहे संरचनात्मक बदलावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

केंद्र सरकार की खाद्य निगम (FCI) देशभर में आधुनिक अनाज भंडारण अवसंरचना विकसित करने के लिए 249 स्थानों पर साइलो निर्माण की योजना पर काम कर रही है। इसमें 9,236 करोड़ रुपये का निवेश PPP मॉडल के तहत 12 राज्यों में किया जाएगा तथा कुल भंडारण क्षमता 111 लाख मीट्रिक टन होगी। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में इन परियोजनाओं का निर्माण कार्य प्रगति पर है। चूंकि उत्तर प्रदेश देश का प्रमुख कृषि उत्पादक राज्य है, इसलिए इस पहल का सबसे अधिक लाभ पाने वाले राज्यों में इसकी गणना की जा सकती है।

वर्तमान व्यवस्था में किसानों को अक्सर अपनी उपज मंडियों में बेचनी पड़ती है, जहां सरकारी खरीद क्षमता और उपलब्ध भंडारण सुविधाओं की सीमाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पर्याप्त भंडारण व्यवस्था के अभाव में अनेक किसानों को अपनी उपज बाजार में अपेक्षाकृत कम कीमतों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इससे किसानों की आय और कृषि क्षेत्र की समग्र उत्पादकता दोनों प्रभावित होती हैं।

आधुनिक साइलो प्रणाली इस समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। बेहतर भंडारण क्षमता उपलब्ध होने पर सरकारी एजेंसियां अधिक मात्रा में अनाज की खरीद कर सकेंगी, जिससे किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर मूल्य प्राप्त होने की संभावना बढ़ेगी। साथ ही, भंडारण के दौरान होने वाली क्षति में भी कमी आएगी और कृषि आपूर्ति श्रृंखला अधिक कुशल बनेगी। विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार इस पहल से भारत को प्रतिवर्ष लगभग 1,350 करोड़ रुपये की बचत होने की संभावना है, जिसका एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों को मिलेगा।

ऐसी स्थिति में कृषि क्षेत्र से होने वाली आय में वृद्धि तथा कृषि उत्पादन के बेहतर मूल्यांकन की संभावना बनती है। यदि यह प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे बढ़ती है, तो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश की जीएसडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान भी बढ़ सकता है। इसलिए कृषि क्षेत्र की वर्तमान स्थिति का आकलन करते समय केवल मौजूदा आंकड़ों को नहीं, बल्कि कृषि अवसंरचना में हो रहे निवेश और नीतिगत सुधारों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

5- लुईस मॉडल की सीमाएं: उत्तर प्रदेश पर लागू क्यों नहीं होता यह पुराना सिद्धांत?

द प्रिंट के लेख में यह तर्क दिया गया है कि उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव नहीं हो रहा, यानी कृषि से श्रमिक निकलकर उद्योगों में नहीं जा रहे। यह तर्क मुख्यतः अर्थशास्त्री आर्थर लुईस के एक पुराने सिद्धांत पर आधारित है।

लुईस का सिद्धांत क्या कहता है?

1954 में अर्थशास्त्री आर्थर लुईस ने एक मॉडल प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार विकासशील देशों में गांवों में बड़ी संख्या में अतिरिक्त मजदूर होते हैं जो खेती में काम तो करते हैं, लेकिन उनका उत्पादन में वास्तविक योगदान बहुत कम होता है। जब ये मजदूर गांव छोड़कर शहर के कारखानों में जाते हैं, तभी देश की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। सरल भाषा में, गांव खाली हो, शहर भरे, तभी विकास होगा।

समस्या क्या है इस सिद्धांत में?

यह सिद्धांत 70 साल पुराना है और उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाता। उत्तर प्रदेश का मजदूर न पूरी तरह गांव में रहता है, न पूरी तरह शहर में। वह दोनों के बीच आता-जाता रहता है। इसे सर्कुलर माइग्रेशन कहते हैं।

एक सरल उदाहरण से समझें: गोरखपुर के रामकुमार को लीजिए। रबी की फसल कटने के बाद अप्रैल में वह दिल्ली जाता है, वहां निर्माण कार्य में काम करता है। अक्टूबर में खरीफ की बुवाई के समय वापस गांव लौट आता है। फिर दिसंबर में दिल्ली, फिर मार्च में वापस।

लुईस के सिद्धांत के अनुसार रामकुमार को या तो किसान होना चाहिए या शहरी मजदूर। लेकिन वह दोनों है। वह एक साथ कृषि अर्थव्यवस्था और शहरी अर्थव्यवस्था दोनों में योगदान दे रहा है।

यह उत्तर प्रदेश की कमजोरी नहीं, लचीलापन है। यह आवाजाही कोई विकास की विफलता नहीं है। यह उत्तर प्रदेश के श्रमिकों की आय सुरक्षा की रणनीति है। जब शहर में काम मिलता है तो वहां जाते हैं, जब फसल का मौसम होता है तो गांव में रहते हैं। इससे न तो खेती पूरी तरह छूटती है, न शहरी आय बंद होती है। कोविड के दौरान जब लाखों प्रवासी मजदूर वापस उत्तर प्रदेश लौटे, तो वे बोझ नहीं बने। उन्होंने खेती में हाथ बटाया, स्थानीय व्यवसाय शुरू किए और राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभाले रखा। यह इसी लचीलेपन का प्रमाण है। इसलिए केवल इसलिए कि उत्तर प्रदेश के श्रमिक लुईस के सिद्धांत के अनुसार गांव छोड़कर स्थायी रूप से शहर नहीं जा रहे, यह नहीं कहा जा सकता कि राज्य में आर्थिक बदलाव नहीं हो रहा। बदलाव हो रहा है, बस उसका स्वरूप अलग है।

6. बुनियादी ढांचा: निवेश और औद्योगिक विकास की आधारशिला

द प्रिंट ने अपने लेख में तर्क दिया है कि उत्तर प्रदेश में सड़कों, एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर व्यापक कार्य हुआ है, लेकिन इसके अनुपात में निवेश आकर्षित नहीं हो पाया है। दूसरे शब्दों में, लेख का दावा है कि बुनियादी ढांचे के विस्तार के बावजूद राज्य में अपेक्षित औद्योगिक निवेश नहीं आया। हालांकि, इस विषय को केवल वर्तमान आंकड़ों के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं होगा। किसी भी राज्य में बुनियादी ढांचा विकास और औद्योगिक निवेश के बीच समय का अंतर स्वाभाविक होता है। सड़क, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारे और लॉजिस्टिक नेटवर्क पहले विकसित किए जाते हैं, जबकि उनके आसपास उद्योगों और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार धीरे-धीरे होता है।

उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में यह प्रक्रिया और भी जटिल है। यहां किसानों का अपनी भूमि से गहरा भावनात्मक और आर्थिक जुड़ाव होता है। भूमि अधिग्रहण, औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने और आवश्यक अनुमतियां प्राप्त करने जैसी प्रक्रियाएं समय लेती हैं। इसलिए बुनियादी ढांचे के निर्माण और निवेश के वास्तविक धरातल पर उतरने के बीच कुछ वर्षों का अंतर असामान्य नहीं माना जा सकता।

दिलचस्प बात यह है कि स्वयं द प्रिंट की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2018 की इन्वेस्टर्स समिट और वर्ष 2023 की ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने निवेशकों के साथ 37.78 लाख करोड़ रुपये के निवेश संबंधी समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए थे। इनमें से लगभग 12.10 लाख करोड़ रुपये मूल्य की परियोजनाओं के लिए ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी आयोजित की जा चुकी है। इसका अर्थ है कि घोषित निवेश का लगभग एक-तिहाई हिस्सा कार्यान्वयन के चरण में प्रवेश कर चुका है।

यह भी समझना आवश्यक है कि बुनियादी ढांचे का वास्तविक आर्थिक प्रभाव समय के साथ दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का उद्घाटन वर्ष 2021 में हुआ था। इसके कुछ वर्षों बाद ही इसके आसपास औद्योगिक गतिविधियां तेज होती दिखाई देने लगी हैं। फरवरी 2026 की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के निकट एक प्रमुख टायर निर्माता कंपनी लगभग 4,000 करोड़ रुपये के निवेश से विनिर्माण इकाई स्थापित करने की योजना पर काम कर रही है।

Source: Dainik Jagran

इसी प्रकार गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे और उससे जुड़े औद्योगिक क्षेत्रों ने भी निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है। खाद्य एवं पेय क्षेत्र की बड़ी कंपनियां यहां उत्पादन इकाइयों की स्थापना की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में धुरियापार औद्योगिक टाउनशिप जैसी परियोजनाएं भी विकसित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों को गति देना है। इसलिए यह कहना कि बुनियादी ढांचे के निर्माण का निवेश से कोई संबंध नहीं है, वास्तविकता का अधूरा आकलन होगा। इतिहास बताता है कि जहां बेहतर सड़क संपर्क, लॉजिस्टिक सुविधाएं और औद्योगिक आधारभूत संरचना विकसित होती है, वहां निवेश और रोजगार के अवसर भी धीरे-धीरे बढ़ते हैं। उत्तर प्रदेश में भी यही प्रक्रिया दिखाई दे रही है।

हालांकि, यह भी सच है कि राज्य को निवेश की गति और बढ़ाने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को और सरल बनाना होगा। भूमि अधिग्रहण, स्वीकृतियों, लाइसेंसिंग और अन्य नियामकीय प्रक्रियाओं में मौजूद नौकरशाही जटिलताओं को कम करके व्यापार करने की सुगमता को और बेहतर बनाया जा सकता है। इससे बुनियादी ढांचे पर किए गए निवेश का लाभ अधिक तेजी से आर्थिक विकास और औद्योगिक विस्तार के रूप में सामने आएगा।

7- सही तुलना का आधार: उत्तर प्रदेश की तुलना किससे होनी चाहिए?

किसी भी राज्य की आर्थिक प्रगति का सही मूल्यांकन तभी संभव है जब उसकी तुलना समान परिस्थितियों वाले राज्यों से की जाए। द प्रिंट के लेख में उत्तर प्रदेश की आर्थिक स्थिति का आकलन करते समय जो मानक अपनाया गया है, वह इस दृष्टि से अधूरा प्रतीत होता है। उत्तर प्रदेश की तुलना अक्सर गुजरात या महाराष्ट्र जैसे राज्यों से की जाती है। लेकिन यह तुलना उचित नहीं है। गुजरात और महाराष्ट्र दशकों से औद्योगिक रूप से विकसित राज्य रहे हैं। इन राज्यों के पास पहले से मजबूत औद्योगिक आधार, बंदरगाह, व्यापारिक परंपरा और कुशल कार्यबल मौजूद था। उत्तर प्रदेश की शुरुआत इन राज्यों जैसी नहीं थी।

उत्तर प्रदेश की तुलना उन राज्यों से होनी चाहिए जो समान ऐतिहासिक, भौगोलिक और आर्थिक परिस्थितियों से गुजरे हैं। इनमें बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान सबसे उचित तुलना के आधार हैं। ये सभी राज्य कृषि प्रधान रहे हैं, इन सभी में बड़ी ग्रामीण आबादी है, औद्योगिक विकास देर से शुरू हुआ और संस्थागत कमजोरियां भी समान रही हैं। जब इस सही आधार पर तुलना की जाती है तो चित्र बिल्कुल अलग दिखता है। बिहार की प्रति व्यक्ति आय उत्तर प्रदेश से काफी कम है। मध्य प्रदेश और राजस्थान की तुलना में उत्तर प्रदेश की जीएसडीपी वृद्धि दर हाल के वर्षों में बेहतर रही है। कानून व्यवस्था, निवेश के माहौल और बुनियादी ढांचे के विकास में भी उत्तर प्रदेश इन राज्यों से आगे निकलता दिख रहा है।

इसलिए उत्तर प्रदेश की आर्थिक यात्रा को समझने के लिए यह जरूरी है कि उसे उसके वास्तविक संदर्भ में देखा जाए, न कि उन राज्यों की कसौटी पर परखा जाए जिनकी परिस्थितियां शुरू से अलग रही हैं।

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